घायल नंदी की पीड़ा देख जागी संवेदना, सामाजिक सहयोग से मिला नया जीवन
सीतापुर। जनपद के विकास खण्ड गोंदलामऊ क्षेत्र से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो जहां एक ओर समाज की संवेदनहीनता को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर मानवता और सेवा भाव का प्रेरणादायक उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। बरगदिया गांव के आसपास सिधौली–मिश्रिख मार्ग पर पिछले एक वर्ष से एक नंदी घायल अवस्था में भटक रहा था। उसके पिछले बाएं पैर में गंभीर घाव हो गया था, जो समय के साथ विकराल रूप लेते हुए कैंसर जैसी स्थिति में बदल गया। इस कारण नंदी को चलने-फिरने में अत्यधिक पीड़ा का सामना करना पड़ रहा था।
स्थानीय लोगों के अनुसार, खेतों में लगाए गए आरी ब्लेड जैसे तेज तारों में फंसने के कारण नंदी का पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था। इलाज और देखभाल के अभाव में घाव लगातार बढ़ता गया, लेकिन किसी ने उसकी सुध नहीं ली। यह स्थिति समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और स्वार्थपरता को दर्शाती है, जहां बेजुबान जीवों की पीड़ा अक्सर अनदेखी कर दी जाती है।
इसी बीच स्वदेशी गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र व कामधेनु फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष मदन पाल सिंह अर्कवंशी की नजर इस पीड़ित नंदी पर पड़ी। नंदी की हालत देखकर वे भावुक हो उठे और तुरंत इसकी मदद के लिए प्रयास शुरू किया। उन्होंने गोंदलामऊ के पशु चिकित्साधिकारी आलोक शुक्ला से संपर्क किया और पूरी स्थिति से अवगत कराया।
पशु चिकित्सा विभाग ने भी संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्रवाई की। सोमवार को दोपहर लगभग डेढ़ बजे चिकित्सकीय टीम मौके पर पहुंची और नंदी को सुरक्षित पकड़ने के लिए बेहोशी का इंजेक्शन दिया गया। लगभग चार घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद, कामधेनु फाउंडेशन की टीम, पशु चिकित्सकों और ग्रामीणों के सहयोग से नंदी को ट्रैक्टर-ट्रॉली के माध्यम से स्वदेशी गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र, तेरवा लाया गया, जहां अब उसका उपचार और संरक्षण किया जा रहा है।
मदन पाल सिंह अर्कवंशी ने इस नंदी की जीवनभर सेवा करने का संकल्प लिया है। उनका कहना है कि मनुष्य को परोपकार और जीव सेवा के मूल सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में गौमाता और नंदी को अत्यंत पूजनीय माना गया है। भगवान शिव स्वरूप नंदी और माता पार्वती के रूप में गौमाता की पूजा का विशेष महत्व है, लेकिन व्यवहारिक जीवन में लोग इनकी सेवा से दूर होते जा रहे हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि आज गौवंश सड़कों, खेतों और जंगलों में भटकने को मजबूर हैं। दुर्घटनाएं, तारों में फंसना और लोगों द्वारा मारपीट जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वेदों और पुराणों में गौमाता के शरीर में 33 कोटि देवताओं का वास बताया गया है और जहां गौमाता सुख पूर्वक निवास करती हैं, वह स्थान तीर्थ के समान होता है।
सरकारी प्रयासों पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निराश्रित गौवंशों के संरक्षण के लिए गौशालाएं खोली गई हैं और प्रति गौवंश 50 रूपए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर लापरवाही के कारण अधिकांश गौशालाओं में पर्याप्त चारा और देखभाल नहीं मिल पा रही है। इससे गौवंशों की स्थिति लगातार खराब हो रही है।
यह घटना न केवल एक घायल नंदी के उपचार की कहानी है, बल्कि समाज के लिए एक संदेश भी है कि बेजुबान जीवों के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी निभाना हम सभी का कर्तव्य है।



