कार्यबल से जनबल तक: योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने के प्रयास और भाजपा के भीतर सत्ता संघर्ष
राष्ट्रीय। वरिष्ठ स्तंभकार दिनेश प्रसाद सिन्हा द्वारा लिखे गए इस राजनीतिक विश्लेषण में उत्तर प्रदेश की राजनीति के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। लेख में कहा गया है कि जिस मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को न तो अपने स्टाफ चयन, न मंत्रिमंडल गठन और न ही चुनावी उम्मीदवार तय करने की पूर्ण स्वतंत्रता मिली, वही मुख्यमंत्री आज अपने कार्यों और निर्णय क्षमता के बल पर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान बना चुके हैं। यही बढ़ती लोकप्रियता कथित रूप से केंद्र की सत्ता में बैठे कुछ लोगों को असहज कर रही है।
लेख के अनुसार, एक बार फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने के प्रयास तेज हो गए हैं। दोनों उपमुख्यमंत्री और संगठन के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी खुले तौर पर उनके खिलाफ बयानबाज़ी करते दिखाई दे रहे हैं, जबकि उनका स्वयं का जनाधार सीमित बताया गया है। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सीटें कम होने का ठीकरा योगी आदित्यनाथ पर फोड़ने को लेखक ने अनुचित और तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया है। उम्मीदवार चयन की जिम्मेदारी केंद्र स्तर पर तय होने के बावजूद असफलताओं का बोझ मुख्यमंत्री पर डालने की कोशिश की जा रही है।
लेख में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर क्षेत्र में परिणाम संतोषजनक रहे, तो अयोध्या, वाराणसी, मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी को झटका क्यों लगा। इन मुद्दों पर आत्ममंथन के बजाय योगी को जिम्मेदार ठहराने की रणनीति अपनाई जा रही है।
दिनेश प्रसाद सिन्हा का मानना है कि योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था, विकास परियोजनाओं और स्पष्ट वैचारिक रुख के जरिए जनता के बीच मजबूत विश्वास अर्जित किया है। यही जनाधार उन्हें एक संभावित राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में स्थापित करता है। लेख के अंत में चेतावनी दी गई है कि यदि योगी आदित्यनाथ को लगातार कमजोर करने का प्रयास जारी रहा, तो उसका जवाब सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता आगामी चुनावों में देगी।

