आख़िर मौन कब तक” समकालीन हिंदी कविता में सामाजिक चेतना और वैचारिक हस्तक्षेप का बना सशक्त उदाहरण
रामबहादुर राय का काव्य-संग्रह “आख़िर मौन कब तक” समकालीन हिंदी कविता में सामाजिक चेतना और वैचारिक हस्तक्षेप का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित यह कविता-संग्रह अपने शीर्षक की तरह ही पाठक से सीधा और असहज प्रश्न करता है। कवि मौन को स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसे चुनौती देते हुए समाज, सत्ता और व्यवस्था की निष्क्रियता पर तीखा प्रहार करता है।

संग्रह की कविताएँ गाँव, शहर और बदलते सामाजिक यथार्थ की गहरी पड़ताल करती हैं। “अंधेरे के उजाले में गाँव कहाँ हैं” कविता विकास के खोखले दावों पर व्यंग्य करती है, जबकि “आज का यह कैसा शहर है” आधुनिक जीवन की चकाचौंध में छिपे अकेलेपन को उजागर करती है। मिथकीय प्रतीकों के माध्यम से कवि वर्तमान नैतिक संकट को रेखांकित करता है, जिससे परंपरा और वर्तमान के बीच सार्थक संवाद स्थापित होता है।
मानवीय संबंधों और आत्मसंघर्ष से जुड़ी कविताओं में संवेदनशीलता और आत्मीयता का स्वर उभरता है। सरल, सीधी और जनधर्मी भाषा में लिखी ये मुक्तछंद कविताएँ पाठक से सीधे संवाद करती हैं। यद्यपि कुछ स्थानों पर भावावेग अधिक प्रतीत होता है, फिर भी संग्रह की प्रतिबद्धता और ईमानदारी इसे विशिष्ट बनाती है। समग्रतः यह कृति पाठक को सोचने और प्रश्न करने के लिए विवश करती है।

